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Saturday, 18 August 2018

प्रतीक्षा

*प्रतीक्षा*

प्रतीक्षा :
अब
एक शापित सम्मोहन है !
एक ऐसी उम्मीद
जो उड़ान चुक गयी है !
एक ऐसा स्वप्न
जो श्रृंगार छोड़ चुका है !

प्रतीक्षा :
अब
हाशिए पर सरकता
एक चेतना शून्य सफ़र है !!
             
              पर ये
             अपने शैशव काल में
             उम्मीद के पँखों पर
             वाचाल थी !
             तब
             इसकी देह को
            ब्रह्माण्ड का विस्तार था !

तब
ये दौड़ती थी
ऐसी गर्म रक्त शिराओं पर
जो ज्वालामुखी का तेज़
निगल जाएँ !

तब
हृदय की धमनियाँ
भूचाल का कम्पन
समेट लें !

आँखें
चाँद को
पलकों से थपथपा दें !
स्मृति के सम्मोहित पट
तब मुस्कान की
मीठी दहलीज़ पर ही
खुलते थे !!
                  पर जैसे धीरे-धीरे
                  उम्र बढ़ती है
                  बिना प्रयास के !
                  प्रतीक्षा भी
                  ढलती जाती है
                  मरती जाती है
                  धीरे-धीरे
                  बेबस
                  बिना यत्न के !!
         
           # राजेश पाण्डेय

सिसकियाँ

*सिसकियाँ*

जीवन
यत्न और यातनाओं
उत्सव और पीड़ा
से परे भी
अनेक यात्राएँ करती है ।
उनमे से
एक यात्रा होती है
ध्वनि की :-
             किलकारी से फूटते
             जीवन के प्रथम नाद से
             चीत्कार और रुदन
             के समापन तक
             जीवन
             ध्वनि तरंगों की एक
              मुसलसल यात्रा है ।
इनमें से सबसे तन्हा
उपेक्षित यात्रा होती है
सिसकियों की यात्रा !!
                भरी महफ़िल में
                किसी अपने की
                फब्तियों पर
                नकली हँसी में
                ज़िंदा दफ़्न होती
                सिसकियाँ !!
बच्चों के आगे
अपमानित होकर
अंगीठी की आँच में
सुलगती सिसकियाँ !!
                छले जाने के बाद
                बन्द कमरे में
                तकिए से गला घोंटती
                सिसकियाँ !!
अफ़सोस और पश्चाताप
की चिता में
निरन्तर धधकती
सिसकियाँ !!
                  ये सिसकियाँ
                  स्पर्श की
                  मोहताज होती हैं
                 और जब कभी
                 अपने भीतर ही
                 किसी अनुभूति का
                 स्पर्श पाती हैं :-
तब फूट पड़ती हैं
कविता , ग़ज़ल , लेख
की शक्ल में
अनहद से स्वर बनकर ।
           
                   # राजेश पाण्डेय

Wednesday, 6 July 2016

चल गुनाह क़बूलते हैं ।

चल गुनाह क़बूलते हैं । स्वप्न की " पहली मिठास " का गुनाह । अरमानों की " पहली उड़ान " का गुनाह । दिल की पहली " तेज धड़कनों " का गुनाह । ज़िंदगी के " पहले स्पर्श " का गुनाह । किसी परम्परा के " प्रथम भंजन " का गुनाह । गुनाह के " पहले अपराध बोध " का गुनाह । ख़ुद से सहम कर जीने का गुनाह । फ़ेहरिस्त लम्बी है - पर चल इनमें से कुछ तो चुनते हैं । चल आज कुछ गुनाह क़बूलते हैं ।
                  ये ज़िंदगी किसी मन्नत की मुहताज  नहीं थी । बस घट गई , इत्तिफ़ाक़न । जैसे गूँजती हैं हर गली मुहल्ले में - किलकारियाँ । पर जनाब इन साँसों ने तो अपनी पहली करवट से ही बाँधना शुरू कर दिया था - मन्नतों का धागा , तमन्नाओं की शक्ल में । अन्नप्रासन की पहली चखन ने गूँथ दिया था, स्वाद का गुनाह - जिह्वा पर । लोरी की पहली मीठी थपकियों ने पिरो दिया था , स्वप्न का गुनाह - पलकों पर , नज़रों में ।  खिलौनों की पहली ज़िद , और उस पर जीते जंग ने , ठुमक कर खड़ा कर दिया था , गुनाहों  का पूरा लश्कर - मन के भीतर । नसीहतों के पहले पाठ ने ही खोल दिए थे सारे बन्द दरीचे - जिज्ञासाओं के । और अब हसरतों का पूरा आसमान सामने है - अनन्त संभावनाओं के झिलमिलाते गुनाह से रौशन ।
         तुम रही थीं मेरे " पहले गुनाह " की साक्षी । पलकों की ओट से निहारने का मेरा पहला गुनाह तुम थीं । मर्यादाओं को लाँघने का मेरा पहला साहस तुम थीं । ज़िंदगी के मन्नत हो जाने की मेरी पहली कशिश तुम थीं । पर तुम तो समझ भी नहीं पाईं थीं , और इन सबमे मैं तेरा गुनाहगार हो चला था । पर इस अपराध बोध की पहली चुभन ने हुमककर धर दिया था छाती पर ज़िद का कच्चा लोहा । जिसे  मैं तबसे पकाता आ रहा हूँ , हर नए गुनाह के साथ - ठोस और ठोस ।
         चल थोड़ा गुनाह तू भी साथ चुन ले । बिजली के तरंगों सी उस प्रथम स्पर्श का गुनाह - जो हथेलियों पर भी हृदय के स्पंदन सा स्पष्ट था । शिष्टाचार के आवरण में जिया हुआ वो हमारा पहला निजी लम्हा । तब हम दोनों गुनाहगार हो चले थे । समझ बूझ कर भी अनजान बने हुए गुनाहगार । पर तब सोचा था चल कुछ गुनाह यूँ भी जी लें - साँझा । गली मुहल्ले में घटती सी ज़िंदगी , तब मन्नत जो हो चली थी ।
         चल आज फिर से हासिए पर पड़ी तमन्नाओं की कोई पुरानी पोटली खोलते हैं , और उसमें से चुनते हैं , मन्नत का सबसे उधड़ा हुआ कोई धागा । और बाँध लेते हैं उसे नए रक्त की किसी उफनती धमनी पर । चल ये ख़्वाब ही सही - पर साथ साथ जिएँ , और बस इतना क़बूलें  , पूरे मन से कि " हाँ , ऐ गुनाह क़बूल है , क़बूल है , क़बूल है " । और जब आँखें छलककर नम रह जाएँ  ; होठ थरथराएँ , लरज़ जाएँ ; रक्त शिराएँ खौलकर थम जाएँ । तो लिख लें कहीं किसी सादे काग़ज़ पर " एक और गुनाह का क़बूलनामा " । बहला लें दिल को गुनाह के एक और हसीन किस्से से ।
                              # राजेश पाण्डेय

Sunday, 8 May 2016

वो मैं ही था ।

गरजते बादलों में , जो घुप्प अँधेरी रात थी , वो मैं ही था ।
बहा ले जाने को व्याकुल , जो बरसात थी , वो मैं ही था ।।
महफ़िलों , नुमाइशों , औ' जश्न में दुनिया रही ;
परेशानियों में , तल्ख़ जो हालात थे , वो मैं ही था ।।
कहकहों में कटी शाम तेरी , हलचलों में दिन ;
उचटती नींद के ,जो अनमने ख़यालात थे, वो मैं ही था ।।
तजुर्बादार रहे लोग तेरे , सुलझे हुए सलाह ;
हमारे बीच , जो उलझे हुए , सवालात थे, वो मैं ही था ।।
हज़ार दाँव चली ज़िंदगी , किस्मत हज़ार चाल ;
लाचार सी पसरी हुई , जो बिसात थी , वो मैं ही था ।।
                      # राजेश पाण्डेय

Sunday, 1 May 2016

शिकवा , गिला

शिकवा , गिला कुछ भी न की , कि बेआबरू होता था वो ।
पर रहा ये इल्ज़ाम सर पर ," कि हर बात पे रोता था वो "।।
बंदिशें इतनी सहीं , कि मैं कभी " मैं " न रहा ;
पर लोग उठने तक जनाज़ा , पूछा किये -- " कैसा था वो ? "
या रब तू मुझसे पूछ मत , हिसाब मेरी ज़िंदगी का ;
अच्छा रहूँ इस फ़ेर में , गुज़ारी जो , धोखा था वो ।।
उस शाम मेरी ज़ब्ते- मोहब्बत , ज़ंजीरे जुनूँ थी , कुछ न था ;
आज पछताता हूँ कि , " हाय इक मौका था वो । "
नाश में हलचल हुई इक , बंद पलकें नम हुईं ;
क्यूँ कफ़न सरका के मेरा ,बेसाख़्ता चौंका था वो ।
                                    # राजेश पाण्डेय

मंज़िल रही न कोई

मंज़िल रही न कोई , क़दमों को राह में ।
चल पड़ी है साँसें , बेनामी सी चाह में ।।
जिस्म भी अब रूह का ताबूत बन चुका है ;
दिल दफ़्न है ख़ामोशियों की क़ब्रगाह में ।।
आँखों में आँच लेकर , सपनों की चिता की ,
ढूँढता हूँ ख़ुद को , सबकी निगाह में ।।
ज़िंदगी में वैसी , तबीअत नहीं रही अब ;
शामिल करूँ मैं कैसे , तुझको निबाह में ।।
ख़्वाहिशें , हैरानियाँ , कमबख़्त से ख़याल ;
कुछ दिल में रह गईं हैं , कुछ निकलीं हैं आह में ।।
                       # राजेश पाण्डेय

तड़प आँसुओं की

तड़प आँसुओं की , मुहताज कब हुई ।
दिल के टूटने पर , आवाज़ कब हुई ।।
तुझको कहाँ ख़बर कि हम बेचैन बहुत हैं ;
दिल के इस हालात पर , बात कब हुई ।।
अपने ही ज़ख़्म पे हूँ मलता , लाचारियों का नमक ;
पर ऐसे किसी वक़्त , मुलाकात कब हुई ।।
झुलसी हो ज़मीं जैसे , फटते हैं होंठ प्यासे ;
सहरा के मुसाफ़िर पे , बरसात कब हुई ।।
                   
                              # राजेश पाण्डेय