Saturday, 26 March 2016

होली के बाद

            ढोल-मजीरों ने पूरी रात पूर्णिमा के चाँद को थरथरा रखा था । अब ख़ामोशी थी । अबीर , गुलाल से किलकारियाँ मारता रंगीन चौराहा अब सुस्ता रहा था । होली के बाद की वो शांत सुबह थी । लाल बाग के मैदान के चारों ओर के रास्ते अलसाए से पड़े थे । मैं कुछ आश्वस्त सा होकर सूरज की पहली किरणों के साथ ही टहलने निकल पड़ा । मैंने वो सारे रंग देखे जो रास्तों पर औंधे पड़े थे , हल्के छाए बादलों और मद्धम बहती हवा ने उनमें एक अलग ही आभा बिखेरी हुई थी ।उनमें से कोई भी रंग मेरा नहीं था । मैं होली खेलता कहाँ हूँ ? वैसे ही जैसे दशहरे की भीड़ में ग़ुम नहीं होता , जैसे नए साल के जश्न में थिरकता नहीं । घर से कोसों दूर , दोस्तों से ज़ुदा , बस्तर के जंगलों के बीच ख़ुद भी खोया खोया सा । पर कभी- कभी सोचता हूँ कि मैं कुछ भी miss  क्यों नहीं करता ? वक़्त ने सीने में ना जाने कौन सा धातू उड़ेल दिया है ? मैं मज़बूत अधिक हुआ हूँ या निष्प्राण ज़्यादा ???
                                        रंग से लाल हुई सड़क की छाती पर पीले , हरे गुलाल लिपटे पड़े थे । कहीं कहीं हल्की चमकती हुई चाँदी सी परत शरमाई हुई लग रही थी । ठीक वैसे ही जैसे मैंने झिझकते हुए उसके गालों पर गुलाल से सनी अपनी उँगलियाँ फेर दी थीं । रंग से पुता उसका चेहरा और सुर्ख़ हो गया था । बड़ी बड़ी कौतूहल भरी आँखों से उसने मुझे थाम लिया था । मुट्ठी भर गुलाल मेरे बालों में ठूंसने। पर ये सब मैं अब क्यों सोचता हूँ ? लम्हों की धीमी आँच में पके रिश्तों का मर्म तो कब का पीछे छूट चुका है । साथ ही वो उल्लास भी ।     " मुझे रंगों से एलर्जी है " :- - सब जानते हैं कि मैं झूठ बोलता हूँ , पर कोई भी ये कहाँ जान पाया कि मैं सिर्फ़ " रंग " कब बोलता हूँ ।
                              तभी एक निरीह सा चौपाया , जो  मानव सभ्यता की शुरुआत से ही हमसे वफ़ादार रहा है  , केमिकल वाले रंगों से लाचार , घबराया सा गुज़रा , और विचार की श्रृंखला करवट लेती है ।  मुझे याद है कैसे हमारी प्यारी रूबी दिवाली के पटाखों से पस्त होकर काँपती हुई बिस्तर  के नीचे दुबक जाती थी । और क्यों मैं आज भी पटाखे नहीं फोड़ता ? त्यौहार के मायने हर किसी के लिए एक से नहीं होते ।
                      कुछ अनमने से वापस लौटते हुए ख़याल आया कि अभी बहुतों को wish करना रह गया है । मेरे लिए त्यौहार के मायने ही बदल गए हैं । संवेदनाओं की नई कसौटियाँ सामने आने लगी हैं । आज मैं सम्बन्धों को मधुरता से ना सही पर व्यवहार की चपलता से निभाना ज़रूर सीख गया हूँ ।
   
                                       # राजेश पाण्डेय

Sunday, 23 August 2015

Compatibility Issue

ठोकर तुम्हारी थी :
                     ( इरादतन ना सही पर सम्भावनाओं का ज्ञान तो तुम्हे भी था । )
और ज़ख़्म मेरे ।।
                    ( और ये स्वाभाविक भी है । )
पर मेरी कराह भी तुम्हें ;
मुख़ालफ़त का भ्रम देती है ।
अब त्यौरियाँ तुम्हारी हैं :
और सदमा मेरा ।।
                    गोया कि मैं
                    दर्द के अलग अलग निशाने पर हूँ ।
                    और तुम्हे आजमाने हैं :
                    शिकायतों के अनगिनत तीर ।।
      #राजेश पाण्डेय
                  

Saturday, 22 August 2015

मुनासिब जो होता ।

वो सपने ,ख़यालात ,वो बेबाक हँसना ;
वो तारों को तकना , कभी रात में ;
जो तुझे लेके उठती थी बेबस तमन्ना ;
इक हँसी बन न जाये कू-ए-यार में ।
बस इतना ही चाहा था इस प्यार में ।।

"हार और जीत ": ये कोई बाज़ी नहीं थी,
ना "पाने और खोने" का बाज़ार था ;
गर कभी याद आऊँ, जो तन्हा रहो ;
इक मुस्कान बिखरे जो रुख़्सार में ।
बस इतना ही चाहा था इस प्यार में ।।
                         # राजेश पाण्डेय

Sunday, 16 August 2015

प्राकृत मैं

          मैं हमेशा से अभ्यस्त रहा हूँ , नीले अनंत की सनातन ख़ामोशी में कहीं दूर खोये रहने का । मुझे आदत सी रही है , उतावले बादलों के संग तैरकर , भींगकर कागज़ों में कविता बनकर उतर आने की । मैं हमेशा से सहज रहा हूँ ; पहाड़ों , नदियों , घाटियों , में अपनी आंतरिक ध्वनि की गूँज से बिखर जाने में । और यह सब इतना स्वाभाविक रहा है कि मुझे एहसास भी नहीं रहता कि प्रकृति  की सारी छटाएँ ; मुस्कान बनकर मेरे  अंतर्मन में तैरती रहती हैं ; आँखों और होंठों से छलकती रहती हैं । ठीक उसी तरह , जिस तरह मैं अलसभोर की अपनी पहली चाय लेकर घर के बाहर झूले पर बैठता हूँ , और आसपास के फूल ,पत्ते , टहनियाँ सब अपने भीतर सहेजी हुई , रात भर की नमी को सतह पर लाकर दमकने लगते हैं , मानों जतला रहे हों , कि उन्हें एहसास है कि मैं आसपास ही हूँ , और आनंदित हूँ । कितना शाश्वत रिश्ता है मेरा , अपने आसपास  चारों ओर फैले और निखरे प्रकृति के असीमित रूपों से । मैं इनमें बिखर सा गया हूँ , ये मुझमें निखर सी गई हैं । प्रेम और आनंद अपनी उन्मुक्तता में ,प्रकृति के माध्यम से मेरे भीतर हमेशा सम्मोहित से रहते हैं ।
                                           #राजेश पाण्डेय
                

Tuesday, 27 August 2013

स्पर्श के सोपान

                                                               
                                                     स्पर्श के सोपान
           अपनेपन से महकी मुस्कुराहटों का एक मुकम्मल सिलसिला रहा और उससे पनपे यक़ीन ने जब तेरी नाज़ुक हथेली मेरे भारी पंजों की जवाबदेह गिरफ़्त में सौंपी, तो वो हमारा पहला स्पर्श था .....और बस उतना ही , और कुछ नहीं !
         फिर बरस बीते , सानिध्य के अविस्मरणीय पल जिये , और एक सुबह तेरी आँखों से दो बूँद नमी हटा कर मैंने साधिकार तेरा माथा चूम लिया था ......पर वो भी बस उतना ही, उससे परे कुछ भी नहीं ।
       इन्द्रजाल सी भावनाओं की इस रवानी का एक पूरा दौर गुज़रा , फिर हमारे दरमियाँ गहराते रिश्ते में , कुछ अपनों की फ़िक़्रमंद दख़ल से हम सहमने लगे ! इल्ज़ाम बस इतना था कि समाज के स्थापित मापदंडों से कुछ ज़ियादा वक्त हमने साथ गुज़ारना चाहा , कसूर इतना कि नज़दीकियों की हमने कोई सीमित परिभाषा नहीं गढ़ी ; और मजबूरन हमने कुछ लम्हे चुराये , अपने लिए !! शायद उसी किसी दौर में एक शाम हमने एक दूसरे की आँखों में कुछ गहराई का इशारा पढ़ा और होंठ नज़दीकियाँ पाकर सकुचाकर रह गए थे ! अब ये रिश्ते का स्वाभाविक पक्ष था या समाज की अवांछित बाधाओं से आहत कुछ और ????? मेरे लिए यह अब भी अनुत्तरित है , पर तुम भी मानोगी कि वो स्पर्श की मधुरतम् प्रतिध्वनि थी ! पर बस उतना ही ,आगे कुछ और नहीं !
       सानिध्य और स्पर्शों के निहायत सूक्ष्म  संकेतों पर तपा और पनपा हमारा रिश्ता आज शब्दों  और संदेहों की निर्मम शल्य चिकित्सा में ठंडा पड़ा है ......जहरीले प्रश्नचिह्नों की शरशैया पर इच्छामृत्यु को शापित ! मज्बूरी ऐसी , की जब तलक इस रिश्ते पे गहराए रहस्यों की सारी गुत्थियाँ सुलझा ना लूँ , ये दम भी तो नहीं तोड़ सकता !
       अवचेतन के नीले अनंत में तैरते ख़्वाबों के इन्द्रधनुषी बादलों का तिलिस्म टूट चुका है !भावनाओं का निष्छल प्रवाह दिल के इर्द गिर्द कहीं सशंकित थमा हुआ है , आँखों में घड़ी- घड़ी उतर आने वाले संवेदनाओं के सोते लुप्त हो रहे हैं ! मैं रिश्तों के सारे अनसुलझे धागों को समाज की पुरातन पोटली में लपेटकर चल पड़ा हूँ , निर्मम यथार्थ की राह !! कभी ज़िम्मेदारी के काँधों पर पोटली बदलता तो कभी सिर पर बोझ की तरह रख कर हठात् लड़खड़ाता ! स्पर्शों के मर्म को दिल की कंदराओं में सुन्न करता !!
                                                                                                                      #  राजेश पाण्डेय

Thursday, 27 June 2013

Himalayan Revenge

      -: हिमालय का दर्द:-
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सैलाब का मंज़र है , लाशें जहाँ - तहाँ रे !
उफ़नते आँसुओं , से आस्माँ निहारें !!
कुछ ग़लतियाँ हमारी , कुछ तल्ख़ियाँ तुम्हारी  ;
क़ुदरत का जो क़हर  हो , पर आस्था  से हारे !!
मेरी  इल्तिजा है तुझसे , गर मेरा गुनाह ठहरा ;
बच्चों को " लाश " ना कर , आबरू बचा रे !!
आस्माँ से आये कुछ हाथ फरिश्तों के ;
कुछ नोचते हैं लाशें , चौखट पे ही तुम्हारे !!
" दर्शन " को  सब यहाँ थे , क्या ये भी ख़ता ठहरी ?
ये कैसा न्याय तेरा ? पूछते हैं सारे !!
                            # राजेश पाण्डेय

Friday, 21 December 2012

दिल दहलाती दिल्ली !!


It is entirely in keeping with Indian tradition and culture to blame and shame the victim of rape rather than the rapist.



क्यूँ आज उस कराहती मर्दानी को देखिये ?
क्यूँ दरिंदगी की दिल्ली - निशानी को देखिये ?
होता है यह तमाशा , हर दौर , हर शहर :-
जाईए  आप अपनी परेशानी को देखिये !!
बीमार मर्दानगी से मग़रूर यहाँ लोग ;
शराफ़त की नपुंसक जवानी को देखिये !!
क्यूँ रात में भी बेटियाँ महफ़ूज़ चले कोई ?
सड़कों पर पसरी हैरानी को देखिये !!
जड़ते हैं नसीहत और बहकते नशे में हैं ;
आँखों के मरते हुए पानी को देखिये !!
" नर्क " को भी क्या जगह दें , मिसाल में :-
शर्मसार होती राजधानी को देखिये !!

                               # राजेश पाण्डेय